Bhagavad Gita: अध्याय 10, श्लोक 8

अहं सर्वस्य प्रभवो मत्त: सर्वं प्रवर्तते |
इति मत्वा भजन्ते मां बुधा भावसमन्विता: || 8||

अहम्-मैं; सर्वस्य-सभी का; प्रभवः-उत्पत्ति का कारण; मत्तः-मुझसे; सर्वम्-सब कुछ; प्रवर्तते-उत्पन्न होता है; इति–इस प्रकार; मत्वा-जानकर; भजन्ते-भक्ति करते हैं; माम्-मेरी; बुधाः-बुद्धिमान; भाव-समन्विताः-श्रद्धा और भक्ति के साथ।

अनुवाद

BG 10.8: मैं समस्त सृष्टि का उद्गम हूँ। सभी वस्तुएँ मुझसे ही उत्पन्न होती हैं। जो बुद्धिमान यह जान लेता है वह दृढ़ विश्वास और प्रेमा भक्ति के साथ मेरी उपासना करता है।

भाष्य

श्रीकृष्ण इस श्लोक का आरम्भ 'अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः' कह कर करते हैं जिसका तात्पर्य है-"मैं ही अन्तिम सत्य और सब कारणों का कारण हूँ।" उन्होंने इसे भगवद् गीता के श्लोक संख्या 7.7, 7.12, 10.5 और 15.15 में कई बार दोहराया है। अन्य ग्रंथों में भी इसे प्रमाणित किया गया है। ऋग्वेद में वर्णन है-

ऋग्वेद में वर्णन हैयं कामये तं तं उग्रं कृणोमि तं ब्रह्माणं तं ऋषिं तं सुमेधाम्।

(ऋग्वेद-10.125.5) 

"मैं जिन मनुष्यों से प्रेम करता हूँ, उन्हें शक्तिशाली बना देता हूँ। मैं उन्हें स्त्री या पुरुष बनाता हूँ। मैं उन्हें ज्ञानी संत बनाता हूँ। मैं जीवात्मा को ब्रह्मा का पद पाने के लिए समर्थ बनाता हूँ। जो बुद्धिमान लोग इस सत्य को समझ लेते हैं वे मुझमें दृढ़ विश्वास रखते हैं और री उपासना करते हैं।" इस प्रकार भगवान श्रीकृष्ण भौतिक और आध्यात्मिक दोनों लोकों के परमेश्वर हैं किन्तु भगवान का मुख्य कार्य सृष्टि की शासन व्यवस्था का संचालन करना नहीं है। चैतन्य महाप्रभु कहते हैं-

स्वयं भगवानेर कर्म नहे भारहरण।

(चैतन्य चरितामृत आदि लीला-4.8)

 "श्रीकृष्ण संसार के सृजन, पालन और संहार के कार्य के लिए प्रत्यक्ष रूप से स्वयं को सम्मिलित नहीं करते।" भगवान श्रीकृष्ण का मुख्य कार्य अपने दिव्य धाम 'गोलोक' में मुक्त आत्माओं के साथ प्रेममयी लीलाओं में लीन होना है। सृष्टि के प्रयोजनार्थ वे स्वयं का विस्तार कारणोदकशायी विष्णु के रूप में करते हैं, जिन्हें महाविष्णु कहा जाता है फिर महाविष्णु भगवान के रूप में भौतिक जगत पर शासन करते हैं। महाविष्णु को प्रथम पुरुष अर्थात भौतिक क्षेत्र में भगवान के सर्वप्रथम विस्तार के रूप में जाना जाता है। वे कारण नामक सागर के दिव्य जल में निवास करते हैं और अपने दिव्य शरीर के रोमों से अनन्त भौतिक ब्रह्माण्डों को प्रकट करते हैं। तत्पश्चात् वे प्रत्येक ब्रह्माण्ड के तल पर रहने वाले गर्भोदकशायी विष्णु के रूप में अपना विस्तार करते हैं जिन्हें द्वितीय पुरुष अर्थात् भौतिक जगत में भगवान का द्वितीय विस्तार कहा जाता है। 

गर्भोदकशायी विष्णु से ब्रह्मा का जन्म हुआ। उनके मार्गदर्शन में ब्रह्माण्ड के विभिन्न स्थूल और सूक्ष्म तत्त्वों एवं पदार्थों का निर्माण, प्राकृतिक नियमों का निर्माण, आकाश गंगाओं और ग्रहों की सूक्ष्म और स्थूल प्रणालियों का निर्माण और उनमें निवास करने वाले जीवों आदि को उत्पन्न करने की प्रक्रिया का सृजन किया जाता है। प्रायः ब्रह्मा का उल्लेख ब्रह्माण्ड के सृजनकर्ता के रूप में किया जाता है। वास्तव में वे सृष्टि के दूसरे क्रम के सृजनकर्ता हैं। गर्भोदकशायी विष्णु आगे फिर क्षीरोदकशायी विष्णु के रूप में अपना विस्तार करते हैं और प्रत्येक ब्रह्माण्ड के ऊपर क्षीरसागर नामक स्थान पर रहते हैं। क्षीरोदकशायी विष्णु को तृतीय पुरूष अर्थात् भौतिक जगत में भगवान का तीसरा विस्तार कहा गया है। प्रत्येक ब्रह्माण्ड के शीर्ष पर रहने के साथ-साथ वह परमात्मा के रूप में ब्रह्माण्ड के सभी जीवों के हृदय में भी वास करते हैं और उनके कर्मों का लेखा-जोखा रखते हैं और उपयुक्त समय पर उन्हें उनके कर्मों के अनुसार फल प्रदान करते हैं। इसलिए उन्हें सभी ब्रह्माण्डों का पालक और संचालक कहा जाता है। 

यहाँ उल्लिखित भगवान विष्णु के रूप भगवान श्रीकृष्ण से किसी भी प्रकार से भिन्न नहीं हैं। इसलिए श्रीकृष्ण इस श्लोक में कहते हैं कि समस्त आध्यात्मिक और भौतिक सृष्टि उनसे ही प्रकट होती है। श्रीकृष्ण को अवतारी भी कहा जाता है क्योंकि वे सभी अवतारों के स्रोत हैं। 

श्रीमद्भागवतम् में वर्णन है

एते चांशकलाः पुंसः कृष्णस्तु भगवान् स्वयम्।

(श्रीमद्भागवतम्-1.3.28) 

"भगवान के सभी रूप उनका विस्तार हैं या श्रीकृष्ण के विस्तारों के विस्तार हैं जो कि भगवान का मूल स्वरूप है और इसलिए सृष्टि के सृजनकर्ता ब्रह्मा, परम परमेश्वर श्रीकृष्ण से प्रार्थना करते हैं।" 

यस्यैकनिश्वासितकालमथावलंब्य जीवन्ति लोमविलजा जगदण्डनाथाः।।

विष्णुर्महान् सैहयस्य कलाविशेषो।

गोविन्दमादि पुरुषं तमहं भजामि ।। 

(ब्रह्मसंहिता-5.48) 

"अनन्त ब्रह्माण्डों में से प्रत्येक ब्रह्माण्ड के शंकर, ब्रह्मा और विष्णु, महाविष्णु के श्वास भीतर लेने पर उनके शरीर के रोमों से प्रकट होते हैं और श्वास बाहर छोड़ने पर पुनः उनमें विलीन हो जाते हैं। मैं, उन श्रीकृष्ण की वन्दना करता हूँ जिनके महाविष्णु विस्तार हैं।" अब श्रीकृष्ण यह व्याख्या करेंगे कि भक्त जन उनकी आराधना कैसे करते हैं।

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