यया तु धर्मकामार्थान्धृत्या धारयतेऽर्जुन |
प्रसङ्गेन फलाकाङ् क्षी धृति: सा पार्थ राजसी || 34||
यया-जिसके द्वारा; तु-लेकिन; धर्म-काम-अर्थान् कर्त्तव्य, सुख और धन; धृत्या-दृढ़ इच्छा द्वारा; धारयते-धारण करता है; अर्जुन-अर्जुनः प्रसङ्गन-आसक्ति के कारण; फल-आकाङ्क्षी-फल की इच्छा; धृतिः-दृढ़ संकल्प; सा-वह; पार्थ-पृथापुत्र, अर्जुन; राजसी-रजोगुण।
BG 18.34: वह धृति जिसके द्वारा मनुष्य आसक्ति और कर्म फल की इच्छा से कर्तव्य पालन करता है, सुख और धन प्राप्ति में लिप्त रहता है, वह राजसी धृति कहलाती है।
दृढ़ता केवल योगियों में ही नहीं पायी जाती। सांसारिक लोग भी अपने कार्यों को दृढ़ता से करते हैं। किंतु उन जीवात्माओं का दृढ़-संकल्प सांसरिक उन्नति से प्रसन्न होने की इच्छा से प्रेरित होता है। उनका ध्यान इन्द्रियों के सुखों को पाने और धन अर्जन की ओर केंद्रित होता है क्योंकि धन इन सब प्रकार के भौतिक सुखों को प्राप्त करने का एकमात्र साधन है। इसलिए ऐसे लोग अपने पूर्ण जीवन धन में आसक्त रहते हैं। श्रीकृष्ण कहते हैं कि फल भोगने की इच्छाओं से प्रेरित धृति राजसी प्रकृति की होती है।
यया तु धर्मकामार्थान्धृत्या धारयतेऽर्जुन |
प्रसङ्गेन फलाकाङ् क्षी धृति: सा पार्थ राजसी || 34||
वह धृति जिसके द्वारा मनुष्य आसक्ति और कर्म फल की इच्छा से कर्तव्य पालन करता है, सुख और धन प्राप्ति …
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