Bhagavad Gita: अध्याय 2, श्लोक 62

ध्यायतो विषयान्पुंस: सङ्गस्तेषूपजायते |
सङ्गात्सञ्जायते काम: कामात्क्रोधोऽभिजायते || 62||

ध्यायत:-चिन्तन करते हुए; विषयान्–इन्द्रिय विषय; पुंस:-मनुष्य की; सङ्ग-आसक्ति; तेषु-उनके (इन्द्रिय विषय); उपजायते-उत्पन्न होना; सङ्गात्-आसक्ति से; सञ्जायते विकसित होती है। कामः-इच्छा; कामात्-कामना से; क्रोध:-क्रोध; अभिजायते-उत्पन्न होता है।

अनुवाद

BG 2.62: इन्द्रियों के विषयों का चिंतन करते हुए मनुष्य उनमें आसक्त हो जाता है और आसक्ति कामना की ओर ले जाती है और कामना से क्रोध उत्पन्न होता है।

भाष्य

क्रोध, लालच, वासना आदि को वैदिक ग्रंथों में मानस रोग कहा गया है। राम चरितमानस मे वर्णन है-"मानस रोग कछुक मैं गाए। हैं सब के लखि बिरलेन्ह पाए।" अर्थात् हम सब शरीर के रोगों से भलीभांति अवगत होते हैं, यहां तक कि केवल एक शारीरिक रोग में इतनी शक्ति होती है कि वह हमारे पूरे दिन को कष्टदायक बना देता है लेकिन हम यह नहीं जानते कि हम निरंतर बहुसंख्यक मानसिक रोगों से ग्रसित हैं। चूँकि हम वासना, लोभ आदि को मानसिक रोग के रूप में स्वीकार नहीं करते अतः उनका निदान करने का प्रयास नहीं करते। मनोविज्ञान मानव के मन मस्तिष्क को समझने की पद्धति है जिसके द्वारा इन रोगों का विश्लेषण करने के पश्चात् इनके उपचार का प्रयास किया जाता है।

 यद्यपि पश्चिमी मनोवैज्ञानिकों द्वारा प्रस्तुत शोधकार्यों पर अभी बहुत कुछ किया जाना शेष है किन्तु ये मन की वास्तविकता के संबंध में केवल अनुमान ही प्रतीत होते हैं। इस श्लोक और आगे के श्लोकों में श्रीकृष्ण ने मन के कार्य-कलापों का पूर्ण एवं सूक्ष्मेक्षिका से वर्णन किया है। उन्होंने स्पष्ट किया है कि जब हम कुछ पदार्थों से मिलने वाले सुख का बार-बार चिन्तन करते हैं तब मन उनमें आसक्त हो जाता है। 

उदाहरणार्थ-एक कक्षा में बहुत लड़के और लड़कियाँ पढ़ते हैं। वे एक-दूसरे के साथ निष्कपट भाव से बातचीत करते हैं किन्तु एक लड़का एक लड़की पर मोहित होकर उसके बारे में सोंचना आरम्भ कर देता है। "यदि यह मेरी मित्र बन जाए, तो मैं बहुत प्रसन्नचित्त रहूँगा।" चूँकि वह अपने मन में उस लड़की का निरन्तर चिन्तन करता है इसलिए उसका मन उसमें आसक्त हो जाता है। वह अपने मित्र को बताता है कि वह उसके प्यार में मतवाला हो गया है और अध्ययन कार्य में उसका मन नहीं लगता क्योंकि उसका मन बार-बार उस लड़की की ओर ही आकर्षित होता है। उसका मित्र उसकी खिल्ली उड़ाते हुए कहता है कि वे सभी कक्षा में उस लड़की के साथ मिलते-जुलते हैं किन्तु उनमें से कोई भी उसके लिए पागल नहीं हुआ है तब फिर तुम क्यों उसके लिए अपनी रातों की नींद खराब कर रहे हो और अपनी पढ़ाई पर ध्यान नहीं दे रहे हो? वास्तविकता यह है कि वह छात्र बार-बार यह चिन्तन करता है कि उस लड़की में सुख है और इसलिए उसका मन उस पर मोहित हो जाता है। इस प्रकार की आसक्ति या मोह अपने आप में एकदम निष्कपट प्रतीत होता है किन्तु समस्या यह है कि मोह से कामना उत्पन्न होती है। यदि किसी की मदिरापान में आसक्ति है, तब उसके मन में बार-बार मदिरापान करने की इच्छा उत्पन्न होगी। यदि किसी की धूम्रपान में आसक्ति है, तब उसका मन बार-बार धूम्रपान में सुख मानकर धूम्रपान करने के लिए तड़पेगा। इस प्रकार आसक्ति कामना की ओर ले जाती है। एक बार जब कामना उत्पन्न होती है तब दो अन्य समस्याओं का जन्म होता है जो हैं लोभ और क्रोध। कामनाओं को पूर्ण करने से लोभ उत्पन्न होता है। ज्यों प्रतिलाभ लोभ अधिकाई।। (रामचरितमानस) "यदि हम अपनी कामनाओं की तुष्टि करते हैं तब वे लोभ की ओर ले जाती है।" इसलिए कामनाओं को पूर्ण करने से इनका नाश नहीं होता।

यत् पृथिव्यां व्रीहियवं हिरण्यं पशवः स्त्रियः। 

न दुह्यन्ति मन:प्रीतिं पुंसः कामहतस्य ते ।।

(श्रीमद्भागवतम्-9.19.13) 

"यदि कोई मनुष्य सभी प्रकार के धन, संपदा, ऐश्वर्य और संसार के इंद्रिय भोग-विलास भी प्राप्त कर ले तो भी उसकी कामनाओं की समाप्ति नहीं होगी इसलिए इसे दुःखों का कारण मानते हुए बुद्धिमान पुरुष को कामनाओं का त्याग करना चाहिए।" इसका दूसरा पहलू यह है कि यदि कामनाओं की पूर्ति में कोई बाधा उत्पन्न होती है तब क्या होगा? इससे क्रोध की ज्वाला उत्पन्न होती है। ध्यान रखें कि क्रोध अपने आप उत्पन्न नहीं होता। यह इच्छाओं की पूर्ति में बाधा आने से उत्पन्न होता है और इच्छाएँ आसक्ति से उत्पन्न होती हैं और आसक्ति इन्द्रियों के विषयों का चिन्तन करने से उत्पन्न होती है। इस प्रकार से हम देखते हैं कि विषयों के सुख का थोड़ा सा भी चिन्तन हमें लोभ और क्रोध दो प्रकार के मनोविकारों की ओर धकेलता है। अगले श्लोक में श्रीकृष्ण इसी कड़ी को जारी रखते हुए इसे अधिक सरल ढंग से व्यक्त करेंगे और क्रोध के दुष्परिणामों की व्याख्या करेंगे।

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