Bhagavad Gita: अध्याय 12, श्लोक 16

अनपेक्ष: शुचिर्दक्ष उदासीनो गतव्यथ: |
सर्वारम्भपरित्यागी यो मद्भक्त: स मे प्रिय: || 16||

अनपेक्ष:-सासांरिक प्रलोभनों से उदासीन; शुचि:-शुद्ध; दक्षः-कुशल; उदासीन:-चिन्ता रहित; गत-व्यथ:-कष्टों से मुक्त; सर्व-आरम्भ-समस्त प्रयत्न; परित्यागी-त्याग करने वाला; यः-जो; मत्-भक्त:-मेरा भक्त; सः-वह; मे मेरा; प्रियः-अति प्रिय।

अनुवाद

BG 12.16: वे जो सांसारिक प्रलोभनों से उदासीन रहते हैं, बाह्य और आंतरिक रूप से शुद्ध, निपुण, चिन्ता रहित, कष्ट रहित और सभी कार्यकलापों में स्वार्थ रहित रहते हैं, मेरे ऐसे भक्त मुझे अति प्रिय हैं।

भाष्य

सांसारिक सुखों के प्रति उदासीनताः किसी निर्धन व्यक्ति के लिए 100 रुपये की हानि और लाभ एक महत्त्वपूर्ण विषय हो सकता है, किन्तु एक करोड़पति इसे कोई महत्त्व नहीं देगा और इस विषय पर आगे कुछ नहीं सोंचेगा। भक्त भगवान के दिव्य प्रेम से युक्त होते हैं और उससे सम्पन्न होने को ही वे परम निधि मानते हैं। वे भगवान की प्रेममयी सेवा को ही प्राथमिकता देते हैं। इसलिए वे सांसारिक सुखों के प्रति भी उदासीन रहते हैं। 

बाह्य और आंतरिक रूप से शुद्धः चूंकि उनका मन निरंतर परम शुद्ध भगवान में तल्लीन रहता है इसलिए भक्त आंतरिक रूप से काम-वासना, क्रोध, लालच, शत्रुता इत्यादि विकारों से मुक्त हो जाते हैं। इस मन:स्थिति में वे स्वाभाविक रूप से अपने शरीर और आस-पास के वातावरण को भी शुद्ध रखते हैं। अतः प्राचीन कहावत के अनुसार 'स्वच्छता का द्वार हैं' को चरितार्थ करते हुए वे बाह्य रूप से भी शुद्ध रहते हैं। 

कार्य-कुशलः भक्त सभी कार्यों को भगवान की सेवा के रूप में देखते हैं इसलिए वे ध्यानपूर्वक और अति सावधानी से अपने कार्य करते हैं। यह स्वाभाविक रूप से उन्हें कार्य कुशल बनाता है।

चिन्ता मुक्तः मन में यह विश्वास रखकर कि भगवान सदैव उनकी शरणागति के अनुसार उनकी रक्षा करते हैं वे चिन्ता मुक्त रहते हैं। 

अव्यथितः चूंकि भक्त अपनी इच्छा भगवान को समर्पित कर देते हैं। अतः वे केवल अथक प्रयासों द्वारा अपने समस्त कार्यों को सम्पन्न करते हैं और उनका फल भगवान की इच्छा पर छोड़ देते हैं। इसलिए जो भी फल प्राप्त होता है उससे वे व्यथित नहीं होते और अपनी इच्छा को दिव्य इच्छा के अधीन मानते हैं।

 सभी कार्यों को निः स्वार्थ भाव से सम्पन्न करनाः उनकी सेवा करने की मनोभावना उन्हें स्वार्थों से ऊपर उठाती है।

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