कृषिगौरक्ष्यवाणिज्यं वैश्यकर्म स्वभावजम् |
परिचर्यात्मकं कर्म शूद्रस्यापि स्वभावजम् || 44||
कृषि-खेती-बाड़ी; गो-रक्ष्य-गोपालन और दुग्ध उत्पादन; वाणिज्यम्-व्यापार; वैश्य-व्यापारी और कृषक वर्ग; कर्म-कार्य; स्वभाव-जम्-स्वाभाविक गुण; परिचर्या-श्रम द्वारा; आत्मकम्-स्वाभाविक; कर्म-कर्त्तव्य; शूद्रस्य-कर्मचारी वर्ग; अपि-भी; स्वभाव-जम्-स्वाभाविक गुण;।
BG 18.44: कृषि, गोपालन और दुग्ध उत्पादन तथा व्यापार, वैश्य लोगों के स्वाभाविक कार्य हैं। शूद्रों के श्रम और सेवा स्वाभाविक कर्म हैं।
वैश्यों में रजोगुण की प्रधानता तथा तमोगुण गौण होता है। इसलिए उनकी रुचि व्यापार और कृषि के माध्यम से अर्थव्यवस्था पर नियंत्रण करने और धनोपार्जन में थी। वे देश की अर्थव्यवस्था को संभालते थे और अन्य वर्गों के लिए रोजगार उत्पन्न करते थे। उनसे समाज के वंचित लोगों के लिए धन सम्पदा दान करने की अपेक्षा की जाती थी। शूद्रों में तमोगुण की प्रधानता होती है। उनकी रुचि विद्वत्ता प्राप्त करने और प्रशासनिक कार्यों या व्यावसायिक उद्यमों में नहीं होती थी। उनके लिए उन्नति का मार्ग समाज की सेवा करना था। कलाकार, तकनीशियन, श्रमिक, दर्जी, कारीगर नाई इत्यादि इस वर्ग में सम्मिलित हैं।
कृषिगौरक्ष्यवाणिज्यं वैश्यकर्म स्वभावजम् |
परिचर्यात्मकं कर्म शूद्रस्यापि स्वभावजम् || 44||
कृषि, गोपालन और दुग्ध उत्पादन तथा व्यापार, वैश्य लोगों के स्वाभाविक कार्य हैं। शूद्रों के श्रम और सेवा स्वाभाविक कर्म …
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