Bhagavad Gita: अध्याय 6, श्लोक 10

योगी युञ्जीत सततमात्मानं रहसि स्थित: |
एकाकी यतचित्तात्मा निराशीरपरिग्रह: || 10||

योगी-योगी; युञ्जीत–साधना में लीन रहना; सततम्-निरन्तर; आत्मानम्-स्वयं; रहसि-एकान्त वास में; स्थित-रहकर; एकाकी-अकेला; यत-चित्त-आत्मा-नियंत्रित मन और शरीर के साथ; निराशी:-कामना रहित; अपरिग्रहः-सुखों का संग्रह करने की भावना से रहित।

अनुवाद

BG 6.10: योग की अवस्था प्राप्त करने के इच्छुक साधकों को चाहिए कि वे एकान्त स्थान में रहें और मन एवं शरीर को नियंत्रित कर निरन्तर भगवान के चिन्तन में लीन रहें तथा समस्त कामनाओं और सुखों का संग्रह करने से मुक्त रहें।

भाष्य

 

योग की अवस्था प्राप्त मनुष्य की विशेषताओं का वर्णन करने के पश्चात् अब श्रीकृष्ण आत्म प्रयास के संबंध में चर्चा कर रहे हैं। किसी भी क्षेत्र में निपुणता के लिए दैनिक अभ्यास करना आवश्यक होता है। तैराकी में ओलिंपिक चैम्पियन वह नहीं हो सकता जो सप्ताह में केवल शनिवार सायंकाल में किसी स्थानीय पड़ोस के स्विमिंग पूल पर अभ्यास करता हो अपितु वही बन सकता है जो प्रतिदिन कई घंटे अभ्यास कर तैराकी में निपुण हो जाता है। अतः आध्यात्मिकता में प्रवीणता पाने के लिए भी इसी प्रकार से अभ्यास करना आवश्यक है। श्रीकृष्ण प्रतिदिन साधना के अभ्यास की अनुशंसा करते हुए आध्यात्मिकता में प्रवीणता प्राप्त करने की पूरी प्रक्रिया का वर्णन करते हैं। प्रथम चरण के लिए वे एकान्त स्थान की अनिवार्यता का उल्लेख करते हैं। प्रायः दिनभर हम सांसारिक वातावरण से घिरे रहते हैं। शारीरिक गतिविधियाँ, लोगों से संपर्क और वार्तालाप आदि सब मन को और अधिक सांसारिक बना देते हैं। मन को भगवान की ओर सम्मुख करने के लिए हमें प्रतिदिन एकान्त में साधना करने के लिए कुछ समय समर्पित करना चाहिए। 

दूध और पानी के उदाहरण से इस बिन्दु को स्पष्ट करने में सहायता मिल सकती है। यदि दूध को पानी में डाल देते हैं तब यह अपनी पहचान नहीं रख सकता क्योंकि पानी स्वभावत: इसमें मिश्रित हो जाता है। किन्तु जब दूध को पानी से अलग रखते हैं और दही जमा लेते हैं और फिर उससे मक्खन निकाल लेते हैं तब मक्खन पानी में घुल नहीं पाता । मक्खन अब पानी को चुनौती देते हुए कह सकता है-'मैं तुम्हारे शीर्ष पर बैलूंगा और तैरता रहूँगा और तुम मेरा कुछ भी नहीं बिगाड़ सकते क्योंकि मैं मक्खन बन गया हूँ।' हमारा मन दूध के समान है और संसार के साथ संपर्क होने से हमारा मन इससे प्रभावित होकर सांसारिक हो जाता है। किन्तु एकांत वातावरण, इन्द्रियों का विषयों के साथ कम से कम संपर्क रखने का अवसर प्रदान करता है और मन को ऊपर उठाकर उसे भगवान में लगाने में सहायक होता है। एक बार जब मन भगवान में पूर्णतः अनुरक्त हो जाता है तब कोई भी संसार को चुनौती देते हुए कह सकता है-"मैं माया के सभी गुणों के बीच रहते हुए उनसे अछूता रहूँगा।" 

एकान्तवास के उपदेश को श्रीकृष्ण ने श्लोक 18.52 में दोहराया है-"विविक्तसेवी लध्वाशी" अर्थात् "एकान्त स्थान में रहो, अपने आहार को संतुलित करो।" अपने व्यावसायिक और सामाजिक कार्यों से छेड़छाड़ किए बिना इस उपदेश का व्यावहारिक रूप से अनुपालन करने का सुन्दर और सरल उपाय यही है। अपने दैनिक कार्यक्रम में हमें कुछ समय साधना या आध्यात्मिक अभ्यास के लिए निश्चित करना चाहिए। हमें स्वयं को एकांत कमरे में जहाँ सांसारिक विघ्न न हों वहाँ संसार से अलग-थलग होकर अपने मन को शुद्ध करके और मन को दृढ़ता से भगवान में केन्द्रित करने के लिए साधना करनी चाहिए। यदि हम इस विधि से दो घंटे अभ्यास करते हैं तब हम सांसारिक गतिविधियों में व्यस्त रहते हुए भी दिन भर इसका लाभ पा सकते हैं। इस विधि द्वारा हम उच्च चेतनावस्था बनाए रखने के योग्य हो सकेंगे जिसका हमने संसार से अलग होकर दैनिक साधना के दौरान संग्रह किया था।

 

स्वामीजी द्वारा इस श्लोक की व्याख्या देखें

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