Bhagavad Gita: अध्याय 7, श्लोक 25

नाहं प्रकाश: सर्वस्य योगमायासमावृत: |
मूढोऽयं नाभिजानाति लोको मामजमव्ययम् || 25||

न न तो अहम्-मैं; प्रकाश:-प्रकट; सर्वस्य–सब के लिये; योग-माया भगवान की परम अंतरंग शक्ति; समावृतः-आच्छादित; मूढः-मोहित, मूर्ख; अयम्-इन; न-नहीं; अभिजानाति–जानना; लोकः-लोग; माम्-मुझको; अजम्-अजन्मा को; अव्ययम्-अविनाशी।

अनुवाद

BG 7.25: मैं सभी के लिए प्रकाशित नहीं हूँ क्योंकि सब मेरी अंतरंग शक्ति 'योगमाया' द्वारा आच्छादित रहते हैं। इसलिए मूर्ख और अज्ञानी लोग यह नहीं जानते कि मैं अजन्मा और अविनाशी हूँ।

भाष्य

श्लोक 7.4 और 7.5 में अपनी दो शक्तियों का वर्णन करने के पश्चात् अब श्रीकृष्ण अपनी तीसरी अतरंग शक्ति 'योगमाया' का उल्लेख करते हैं। यह भगवान की परम शक्ति है। विष्णु पुराण में इस प्रकार से वर्णन किया गया है

विष्णु शक्तिः परा प्रोक्ता क्षेत्रज्ञाख्या तथाऽपरा।

अविद्या कर्म सञ्ज्ञान्या तृतीया शक्तिरिष्यते ।।

 "परमात्मा श्री विष्णु की तीन प्रमुख शक्तियाँ हैं-योगमाया, जीव और माया।" जगद्गुरु श्री कृपालु जी ने भी इसका विशद वर्णन किया है

शक्तिमान की शक्तियाँ, अगनित यदपि बखान।

 तिन महँ 'माया', 'जीव', अरु, 'परा' त्रिशक्ति प्रधान ।। 

(भक्ति शतक श्लोक-3) 

"शक्तिमान परमात्मा श्रीकृष्ण की अनन्त शक्तियाँ हैं। इनमें योगमाया, जीव और माया प्रमुख हैं" 

दिव्य अंतरंग शक्ति 'योगमाया' भगवान की सर्वोच्च शक्ति है जिसके द्वारा वे अपनी दिव्य लीलाएँ, अपना दिव्य प्रेम, अपना दिव्य आनन्द और दिव्य लोक प्रकट करते हैं।

 भगवान संसार में अवतार लेते हैं और पृथ्वी लोक पर अपनी लीलाओं को प्रकट करते हैं। इसी योगमाया की शक्ति द्वारा वे स्वयं को आच्छादित रखते हैं। यद्यपि भगवान हमारे हृदय में विराजमान हैं किन्तु हमें उनकी उपस्थिति का कोई बोध नहीं होता। जब तक योगमाया उनकी दिव्यता को हमसे गुप्त रखती है तब तक हम उनके दिव्य दर्शन करने में समर्थ नहीं हो सकते। इसलिए यदि हम वर्तमान में भगवान को साकार रूप में भी देखते हैं तब भी हम उन्हें भगवान के रूप में पहचानने में समर्थ नहीं हो सकते। जब भगवान की योगमाया शक्ति हम पर कृपा करती है केवल तभी हम भगवान के दिव्य रूप को देख सकते हैं और उन्हें भगवान के रूप में पहचानने लगते हैं।

चिदानंदमय देह तुम्हारी।

बिगत विकार जान अधिकारी।। 

(रामचरितमानस)

 "हे भगवान, आपका स्वरूप दिव्य है। केवल वे जिनका हृदय शुद्ध है, आपकी कृपा से आपको जान सकते हैं।" 

योगमाया शक्ति निराकार और साकार दोनों रूपों में प्रकट होती है जैसे कि राधा, सीता, काली, लक्ष्मी, पार्वती आदि। ये सब योगमाया शक्ति के दिव्य रूप हैं और वैदिक संस्कृति में इन सबको ब्रह्माण्ड की माँ के रूप में चित्रित किया गया है। ये अपनी उदारता, करुणा, क्षमा, और अकारण प्रेम जैसे गुणों से प्रकाशित हैं। हमारे लिए यह जानना अत्यंत महत्वपूर्ण है कि ये जीवात्मा पर अपनी दिव्य कृपा बरसाते हुए उन्हें अलौकिक ज्ञान प्रदान करती हैं जिसके द्वारा वह भगवान को जान सके। इसलिए वृंदावन के भक्त 'राधे राधे श्याम मिला दे' गाते रहते है अर्थात 'हे राधे! अपनी अनुकम्पा प्रदान कर कृष्ण से मिलने में मेरी सहायता करो।' इस प्रकार योगमाया दोनों कार्य करती है। वह भगवान को उन जीवात्माओं से आच्छादित रखती है जिनमें भगवान को जानने की पात्रता नहीं होती और शरणागत जीवात्माओं पर कृपा करती है ताकि वे भगवान को जान सके। वे लोग जिन्होंने भगवान की ओर अपनी पीठ कर रखी है अर्थात् जो भगवान से विमुख रहते हैं, वे माया से आच्छादित हो जाते हैं और योगमाया की कृपा से वंचित रहते हैं। जो भगवान की ओर अपना मुख कर लेते हैं वे योगमाया की शरण में आते हैं और माया के बंधनों से मुक्त हो जाते हैं।

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