Bhagavad Gita: अध्याय 8, श्लोक 14

अनन्यचेता: सततं यो मां स्मरति नित्यश: |
तस्याहं सुलभ: पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिन: || 14||

अनन्य-चेताः-बिना विचलित मन से; सततम्-सदैव; यः-जो; माम्–मुझमें; स्मरति-स्मरण; नित्यश:-नियमित रूप से; तस्य-उसका; अहम्-मैं हूँ; सु-लभः-सरलता से प्राप्त; पार्थ-पृथापुत्र; अर्जुन; नित्य-निरन्तर; युक्तस्य–तल्लीन; योगिनः-योगी।

अनुवाद

BG 8.14: हे पार्थ! जो योगी अनन्य भक्ति भाव से सदैव मेरा चिन्तन करते हैं, उनके लिए मैं सरलता से सुलभ रहता हूँ क्योंकि वे निरन्तर मेरी भक्ति में तल्लीन रहते हैं।

भाष्य

 

 पूरी भगवद्गीता में श्रीकृष्ण बारम्बार भक्ति की महत्ता पर बल देते हैं। पिछले श्लोक में श्रीकृष्ण ने भगवान के निराकार स्वरूप और निर्गुण साधना को प्रतिपादित किया है। जो केवल नीरस ही नहीं अपितु अत्यंत कठिन भी है। इसलिए अब वे सरल विकल्प को अभिव्यक्त कर रहे हैं जो भगवान के दिव्य साकार रूप जैसे कृष्ण, राम, शिव, विष्णु इत्यादि हैं। इनमें भगवान का नाम, रूप, गुण, लीला, धाम और उनके परम दिव्य स्वरूप युक्त संत सम्मिलित हैं। पूरी गीता में केवल यही एक श्लोक है जिसमें श्रीकृष्ण कहते हैं कि उन्हें पाना सरल है किन्तु इसकी शर्तों के संबंध में 'अनन्यचेताः' अर्थात् 'कोई अन्य नहीं' शब्द कहा गया है जिसका अर्थ है कि मन अनन्यता से केवल उनमें तल्लीन रहना चाहिए। अनन्य शब्द अत्यंत महत्वपूर्ण है। व्युत्पत्ति विज्ञान में इसका अर्थ 'न अन्य, या कोई अन्य नहीं है। अर्थात् मन भगवान के अलावा किसी और में आसक्त नहीं होना चाहिए। इस अनन्यता की शर्त को भगवद् गीता में बार-बार दोहराया गया है। अनन्याश्चिन्तयन्तो मां (9.22), तमेव शरणं गच्छ (18.62), मामेकं शरणं व्रज। (18.66) 

अन्य वैदिक ग्रंथों में भी अनन्य भक्ति के महत्त्व पर बल दिया गया है।

"मामेकमेव शरणमात्मानं सर्वदेहिनाम्।" 

(श्रीमदभागवतम्-11.12.15)

 "तुम सब प्राणियों के आत्मस्वरूप मुझे एक परमात्मा की ही शरण ग्रहण करो।"

एक भरोसो एक बल एक आस विस्वास। 

(रामाचरितमानस) 

"मेरा केवल एक सहायक, एक सामर्थ्य, एक विश्वास और शरण श्री राम है"

अन्याश्रयाणां त्यागोऽनन्यता ।। 

(नारद भक्ति दर्शन सूत्र-10)

 "भगवान को छोड़कर दूसरे आश्रयों के त्याग का नाम अनन्यता है।" 

अनन्य भक्ति से तात्पर्य यह है कि केवल भगवान के नाम, रूप, गुण, लीला, धाम और भगवान के संतों के प्रति ही मन की आसक्ति होनी चाहिए। इसका तर्क अत्यंत सरल है। साधना का उद्देश्य मन को शुद्ध करना है और यह केवल मन को पूर्ण शुद्धात्मा भगवान में अनुरक्त करने पर ही संभव है। किन्तु यदि हम भगवान का चिन्तन कर मन को शुद्ध करते हैं और फिर सांसारिकता में डूब कर उसे पुनः मलिन कर देते हैं, तब चाहे हम कितनी अवधि तक ही क्यों न प्रयास करें, हम कभी इसे शुद्ध नहीं कर सकते। 

इस प्रकार की भूल प्रायः कई लोग करते हैं। वे भगवान से प्रेम करते हैं और संसार के लोगों और पदार्थों में भी आसक्त रहते हैं। साधना भक्ति द्वारा वे जो कुछ भी आध्यात्मिक लाभ प्राप्त करते हैं वह सब सांसारिक आसक्ति के कारण दूषित हो जाता है। यदि हम साबुन से कपड़ों को साफ करते हैं किन्तु साथ ही साथ उन पर गंदगी डालते हैं तब हमारा प्रयास व्यर्थ हो जाएगा। इसलिए श्रीकृष्ण कहते हैं कि केवल भक्ति नहीं अपितु उनके प्रति अनन्य भक्ति से ही वे सरलता से प्राप्त होते हैं।

 

स्वामीजी द्वारा इस श्लोक की व्याख्या देखें

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8. अक्षर ब्रह्म योग

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